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गुरुवार

GHAZAL


घर लौट के आए अब ख़ामोशी से जलते हैं 
अलफ़ाज़ के सिक्के तो बाज़ार में चलते हैं 

       टकराईं उदासी से फिर ख़ुशियाँ हुईं ज़ख़्मी 
लगता है के आईनों में हादसे पलते हैं 

चुप रहना इबादत है ज़ुल्मत की ख़ुदाई में 
शैतानी है आँखों की जो आँसू निकलते हैं 

      बर्दाश्त नहीं करते ग़ुस्से  की तपिश दोनों 
                 तुम रोज़ उबलते हो हम रोज़ पिघलते हैं