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शुक्रवार

GHAZAL

लौटी मेरी सदा तो मैं शरमिन्दा हो गया 

कोई नहीं हुआ तो मैं शरमिन्दा हो गया

            कागज़ की एक नाव मैं, दरिया सा तेरा जिस्म 
        
            चलने लगी हवा तो मैं शरमिन्दा हो गया 

ख़ामोश रह के देता था ज़ालिम का साथ ख़ौफ़ 

मज़लूम  मर गया तो मैं शरमिन्दा हो गया


            गिरता हुआ वो बूढ़ा लतीफ़ा न था कोई

            बच्चा कोई हँसा तो मैं शरमिन्दा  हो गया 

बेशर्मी रक्स करती है परदे में शर्म के 

सब ने यही कहा तो मैं शरमिन्दा हो गया