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बुधवार

GHAZAL

ख़ौफ़ लालच के दिल में पलता रहा 
आरज़ू का गुनाह टलता रहा 


धूप  में चाँद छत पे क्या दिखता 
                      बेवकूफ़ इन्तजार जलता रहा 

लग्ज़िशों की मुखालिफ़त का उसूल 
रोज़ सूरज के साथ ढलता रहा 

ज़िन्दगी सच का वो दरख़्त बनी 
  जिस की शाख़ों पे झूठ फलता रहा 

अक़्ल मायूस थी सो अब भी है 
वो अक़ीदा  था जो बदलता रहा