ख़ौफ़ लालच के दिल में पलता रहा
आरज़ू का गुनाह टलता रहा
आरज़ू का गुनाह टलता रहा
धूप में चाँद छत पे क्या दिखता
बेवकूफ़ इन्तजार जलता रहा
लग्ज़िशों की मुखालिफ़त का उसूल
रोज़ सूरज के साथ ढलता रहा
ज़िन्दगी सच का वो दरख़्त बनी
जिस की शाख़ों पे झूठ फलता रहा
अक़्ल मायूस थी सो अब भी है
वो अक़ीदा था जो बदलता रहा